आज हो गया विलीन,
श्वान की मुस्कान पर |
कल कभी आएगा क्या !
टूटे हुए सपनों के बिच में,
गली आगे से बंद है,
मोड़ दिखती है मगर |
आज आयेगा अभी,
ये चोट दुखती है अगर|
आज कल को छोड़ के,
अब में बदल दो स्वयं को|
शेष निज - निज स्वपन को,
साकार कर देगा अभी |
आज कर लेंगे बाली प्रविर्ती भी इंसान को धोखा दे जाती है इसीलिए इस आज को अब में बदलने की जरूरत है हम सबको |इसी भाव को मन में रखते हुए मै इस कविता को लिखा हूँ| ......कुंवर ......
रविवार, 24 मई 2009
गुरुवार, 21 मई 2009
कदम तो बढ़ा
कदम तो बढ़ा,
राह को राही का इंतजार है |
बाट जोह रही तेरी उपलब्धियां,
उसे तेरा ही इंतजार है|
कदम के फासले पे मिलता है सबकुछ,
बस तू यूँ ही कदम बढाये जा|
गम के साये में भी,
खुशी के गीत गए जा|
जो भी मिला- जैसा मिला,
वो है काम का- ये तू मान ले |
समय साबित कर दिखायेगा ये,
ये तू जान ले- ये तू जान ले |
मिले तिरिस्कार या मिले सम्मान,
हर इक की कीमत होती है|
तुझे तुझसे मिलाने के - हैं साजो- सामान ये,
ये तू जान ले- ये तू जान ले|
थक - हार् कर, न तू बैठना,
तिरिस्क्रित होकर, न तू मुहं मोड़ना|
तेरी उपलब्धियों के, नजदीक होने के,
निशाँ है ये, ये तू जान ले|
चल उठ खड़ा हो दुने जोश से,
और बढ़ा तू इक कदम पुरे होश से|
पा जाएगा, मिल जाएगा, तुझे तेरी उपलब्धियां,
ये तू मान ले - ये तू मान ले |
कदम तो बढ़ा,
राह को राही का इंतजार है|
बाट जोह रही तेरी उपलब्धियां,
उसे तेरा ही इंतजार है|
ये पंक्तियाँ हर इक के लिए है, सबसे पहले मैं ये मानता हूँ कि
कोई भी, कभी भी असफल हो ही नहीं सकता|
जहाँ आपको जाना है 'नियति' को पता है आपको वहीं पे ले जाकर छोडेगी ये,
लेकिन शर्त है कि आपको कदम बढ़ाना होगा|
बिना कर्म-योग के कुछ भी फलित नहीं होता|
हमें कार्य - कारणवाद के सिधांत को समझना चाहिए|
...कुंवर...
रविवार, 17 मई 2009
ऐ मेरे भाई ठहर न जरा तू
ऐ मेरे भाई ठहर न जरा तू,
खुद से मुलाकात कर ले फिर जाना|
खुद को भुला के कहाँ जा रहे हो,
यूँ ही किसी राह पे क्यों चले जा रहे हो|
कहाँ जाना है -
ये भी तो सोचो।
डगर किधर को चली है -
ये भी तो देखो।
बिना जाने बस यूँ ही
चले जा रहे हो|
क्यों हालात को -
खुद पे हावी होने देते।
हालात पे हावी होकर बढो न |
तुम्हीं मांझी हो -
अपने इस सफर का।
तुम्हारी ही मर्जी -
अपनी नैया
जिस किनारे लगा लो|
हो बेफिक्र सा क्यों -
थोड़ा फिक्र कर लो।
यही तो समय है -
निज से निज का
जिक्र कर लो|
अपने आवाज को
न तुम ऐसे दबाओ।
अंतस से जो आ रही -
उसे तुम जगाओ|
वीरान भी
हरियाली बन उठेगी।
खुद ही खुद को ,
बनाते चलो न |
जीवन में शायद प्रत्येक इंसान के साथ ऐसा होता है कि
कुछ कार्य आत्म-अनुशंषा के बिना ही शुरू हो जाता है और
बो दौरने भी लगता है अपनी जिंदगी में|
बुद्धि इन कार्यों पे सवाल उठाती है पूछती है
बो कहाँ चले, किधर चले, क्यों चले, कहाँ ले जायेगी ये डगर जानते हो क्या|
सो ये कविता बुद्धि के द्वारा मन से किया गया सवाल है|
स्वाभाविक है ये सवाल मेरी बुद्धि ने मुझ (मन) से की है और
प्रत्येक की बुद्धि उसके मन से ये सवाल करती है,
कोई सुनता है तो कोई अनसुना करके निकल लेता है|
उम्मीद है आप सब स्वयं को इस सवाल में कभी न कभी पाएंगे।
...कुंवर...
गुरुवार, 14 मई 2009
हे गुरु
हे गुरु,
जब वो मेरे ही अन्दर है,
तो मन में ये अँधेरा कैसा|
हर पल को लुटने वाला,
ये लुटेरा कैसा|
भान है उस वक्त का,
ज्ञान है उस सत्य का|
फिर भी फिसल जाता हूँ क्यों,
रात की सन्नाटे में खो जाता हूँ क्यों|
क्या यूँ ही चलना होगा,
रात के सन्नाटे को भी जीना होगा|
जीवन जो एक दर्शन है,
ज्योति जो आकर्षण है,
दृश्य कब होंगे मुझे |
एक ज्योति से ही प्रज्वलित हर देही है,
ये भान कब होगा मुझे|
सुन रखा है बार- बार,
पर दृश्य कब होंगे मुझे|
गुरु तो एक सत्ता है,
और हूँ सम्पर्पित उस सत्ता को|
भान है उस वक्त का,
ज्ञान है उस सत्य का|
जब ये खग उडेगा,
जब ये खग उडेगा|
तोड़ कर हर निजता को,
पाने को उस प्रभुता को |
जो आकांक्षित कर रखा है, जन्मों से |
जो आकांक्षित कर रखा है, जन्मों से |
सुन रक्खी है मैंने ढेर सारी बातें, कुछ पढ़कर तो कुछ महापुरुषों से लेकिन ये साक्षात् कब होगा जीवन में| ये जो रहस्य रूपी चादर ओढ़ रक्खी है जीवन ने, ये चादर कब हटाई जायेगी|
सबाल है कि दिये के निचे जो अँधेरा है उसे कैसे मिटाऊँ................कुंवर......
जब वो मेरे ही अन्दर है,
तो मन में ये अँधेरा कैसा|
हर पल को लुटने वाला,
ये लुटेरा कैसा|
भान है उस वक्त का,
ज्ञान है उस सत्य का|
फिर भी फिसल जाता हूँ क्यों,
रात की सन्नाटे में खो जाता हूँ क्यों|
क्या यूँ ही चलना होगा,
रात के सन्नाटे को भी जीना होगा|
जीवन जो एक दर्शन है,
ज्योति जो आकर्षण है,
दृश्य कब होंगे मुझे |
एक ज्योति से ही प्रज्वलित हर देही है,
ये भान कब होगा मुझे|
सुन रखा है बार- बार,
पर दृश्य कब होंगे मुझे|
गुरु तो एक सत्ता है,
और हूँ सम्पर्पित उस सत्ता को|
भान है उस वक्त का,
ज्ञान है उस सत्य का|
जब ये खग उडेगा,
जब ये खग उडेगा|
तोड़ कर हर निजता को,
पाने को उस प्रभुता को |
जो आकांक्षित कर रखा है, जन्मों से |
जो आकांक्षित कर रखा है, जन्मों से |
सुन रक्खी है मैंने ढेर सारी बातें, कुछ पढ़कर तो कुछ महापुरुषों से लेकिन ये साक्षात् कब होगा जीवन में| ये जो रहस्य रूपी चादर ओढ़ रक्खी है जीवन ने, ये चादर कब हटाई जायेगी|
सबाल है कि दिये के निचे जो अँधेरा है उसे कैसे मिटाऊँ................कुंवर......
जीवन की सतरंगी वेला
जीवन की सतरंगी वेला,
कैसे हो गया अकेला |
घर से चला था सपनों लेकर,
टूट गया ये मोती बनकर |
छुट गया घर -छूटे अपने,
घर की माटी भी हैं सपने|
हर पल कहता - क्या हो गया ये,
कहाँ को चले थे -कहाँ आ गए ये|
क्या मैं दिखाऊँ-कुछ न संभाला,
समय से ऐसा परा मेरा पाला,
हो गयी सतरंगी वेला ये अकेला|
शायद इसमें ही कुछ मिल जाय,
जिसके लिए चला था,
वो भी संभल जाय|
फिर से जागी है इक आशा,
रात भयाबह अब जायेगी,
अपनी सुबह अब आएगी |
नीरसता को सींची आशा,
फिर से दे डाली मुझे सपने,
सपने पुरे होने पर,
मिल जायेंगे घर और अपने|
कैसे हो गया अकेला |
घर से चला था सपनों लेकर,
टूट गया ये मोती बनकर |
छुट गया घर -छूटे अपने,
घर की माटी भी हैं सपने|
हर पल कहता - क्या हो गया ये,
कहाँ को चले थे -कहाँ आ गए ये|
क्या मैं दिखाऊँ-कुछ न संभाला,
समय से ऐसा परा मेरा पाला,
हो गयी सतरंगी वेला ये अकेला|
शायद इसमें ही कुछ मिल जाय,
जिसके लिए चला था,
वो भी संभल जाय|
फिर से जागी है इक आशा,
रात भयाबह अब जायेगी,
अपनी सुबह अब आएगी |
नीरसता को सींची आशा,
फिर से दे डाली मुझे सपने,
सपने पुरे होने पर,
मिल जायेंगे घर और अपने|
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
कहाँ से ढूंढ लाऊँ ...


