कुछ दिनों पहले, बहुत दिनों के बाद,
भाव फिर से छलकना शुरू हुआ तो
हाथों ने लेखनी थाम ली और मन ने कहा
की मैं लिखूंगा इक बार फिर लिखूंगा ......
परिणाम आपके सामने है :-----
..................समर्पण ...................
हे ईश्वर, अर्पित करता हूँ ...
समर्पित करता हूँ, सर्वस्व अपने आप को ...
कुछ भी नहीं, इस नश्वर जग में...
जो दे सके सुकूँ, व्यथित मन को ...
जग हजारों कार्य के , हजारों कारण निकाल लेते हैं ...
लेकिन आखिर इस विधा से, क्या पा लेते हैं ...
अब तो करता हूँ, मन का अर्पण और समर्पण ...
एक मात्र उस सत्ता को, जिसे अंतस की आवाज ईश्वर कहते हैं ...
हो सकता है किसी और का अंतस, उसे कुछ और कहता हो ...
लेकिन है वही इक मात्र कारण, इस विश्व रूपी कार्य का...
DESK OF INDIAN EINSTEIN.........@...SPIRTUALITY......
GOAL IS TO EXPLORE "THE THEORY OF EVERYTHING" SPIRTUALLY
रविवार, 11 सितम्बर 2011
बृहस्पतिवार, 31 दिसम्बर 2009
चलिए
फिक्र इसकी न करें कि चलना है ,
फिक्र इसकी करें कि किधर चलना है|
चला तो आपको प्रक्रति देगी,
परन्तु हर मोड़ पे विस्मृति देगी|
विस्मृति कि किधर चलना है,
और कब संभलना है|
लड़ाई अपनी विस्मृति से करना है,
और चलते- चलते ही हर मोड़ पे संभलना है|
इस फिक्र को चिंतन समझिये,
हर मोड़ पे बुद्धि से विचार मंथन समझिये|
मंथन से मूलतः दो भाग ही तो मिलता है ,
अच्छा - बुरा वहां साफ - साफ दिख पड़ता है|
अच्छाई को पकड़ते चलिए ,
कदम दर कदम खुद को उठाते चलिए|
जब भी जीवन में दिशा पे सवाल उठे,
तो यूं ही विचार मंथन कीजिये|
पुनः मिले दो भाग में से,
अच्छे को पकड़ते चलिए|
इस प्रकार उस ऊंचाई कि तरफ ,
खुद को उठाते चलिए|
वो ऊंचाई, जो कि हमेशा एक आदर्श रहा,
क्योंकि उससे से ऊँचे का कोई प्रमाण नहीं|
ये जो दिशा कि फिक्र करना है,
हर मोड़ पे संभलना है |
संभलने से वास्ता चिंतन का है,
चिंतन का रिश्ता विचार मंथन से है|
इसे ही जीवन का सूत्र वाक्य समझिये,
गर ये सूत्र आपने पास है तो,
जीवन कि हर समस्याओं का समाधान,
अपने पास समझिये|
इसलिए किधर चलना है,
ध्यान में रख कर चलिए|
ध्यान रखना अपनी जिम्मेदारी है,
नव वर्ष में अपनी जिम्मेदारी,
अपने कन्धों पे उठा के चलिए|
इसी भाव के साथ आप सब को नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें|
फिक्र इसकी करें कि किधर चलना है|
चला तो आपको प्रक्रति देगी,
परन्तु हर मोड़ पे विस्मृति देगी|
विस्मृति कि किधर चलना है,
और कब संभलना है|
लड़ाई अपनी विस्मृति से करना है,
और चलते- चलते ही हर मोड़ पे संभलना है|
इस फिक्र को चिंतन समझिये,
हर मोड़ पे बुद्धि से विचार मंथन समझिये|
मंथन से मूलतः दो भाग ही तो मिलता है ,
अच्छा - बुरा वहां साफ - साफ दिख पड़ता है|
अच्छाई को पकड़ते चलिए ,
कदम दर कदम खुद को उठाते चलिए|
जब भी जीवन में दिशा पे सवाल उठे,
तो यूं ही विचार मंथन कीजिये|
पुनः मिले दो भाग में से,
अच्छे को पकड़ते चलिए|
इस प्रकार उस ऊंचाई कि तरफ ,
खुद को उठाते चलिए|
वो ऊंचाई, जो कि हमेशा एक आदर्श रहा,
क्योंकि उससे से ऊँचे का कोई प्रमाण नहीं|
ये जो दिशा कि फिक्र करना है,
हर मोड़ पे संभलना है |
संभलने से वास्ता चिंतन का है,
चिंतन का रिश्ता विचार मंथन से है|
इसे ही जीवन का सूत्र वाक्य समझिये,
गर ये सूत्र आपने पास है तो,
जीवन कि हर समस्याओं का समाधान,
अपने पास समझिये|
इसलिए किधर चलना है,
ध्यान में रख कर चलिए|
ध्यान रखना अपनी जिम्मेदारी है,
नव वर्ष में अपनी जिम्मेदारी,
अपने कन्धों पे उठा के चलिए|
इसी भाव के साथ आप सब को नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें|
सोमवार, 12 अक्तूबर 2009
जब मै ४२ घंटे बाद सो सका .....
करीब १५ दिन पहले कुछ आवश्यक काम के बोझ तले और भावनात्मक कष्ट के कारन जब मै ४२ घंटेतक नही सो सका था| उस समय मेरी पहली इच्छा थी की मै किसी तरह सो सकूं लेकिन नींद आंखों सेकोशों दूर थी|घर से फ़ोन भी उसी दौरान आया था की मेरी माँ अस्वस्थ है,मन ख़ुद को कोष भी रहा था कीमै इतना दूर क्यूं हूँ |इन्ही सब उधेरबुन मै फसं कर मै सो नही पा रहा था |
दूसरी रात के ११ बजे थे और मै परेसान था अपने सारे उपायों के बिच की मै किसी तरह सो जाऊं|हार करमै सोचा अब दीदी से बात कर लूँ शायद कुछ आराम मिले|फ़ोन लगाया तो पता चला की दीदी, जीजा जीऔर मेरी भांजी (प्यारी सी ५ साल की है ) अभी तक जग रही है बात किया उन सभी से और खूब हँसा, अपनी भांजी की तोतली बातों को सुन कर|
इससे पहले मै अपने एक मित्र को भी कॉल किया था जो की अपने फैमली मेम्बेर्स के साथ डिनर मेंमशगुल थे, सो उनसे बाद में बात करना मुनासिब समझा| जब मै दीदी से बात करके खाली हुआ तो मेरेमित्र मिस कॉल कर चुके थे| सोचा चलो इनसे भी बात कर ही लूँ|
सो लगा उनसे सोने के लिए कुछ टिप्स लेने, अपनी क्षमता अनुसार उन्होंने टिप्स भी दिया लेकिनइमानदारी से कहूं तो उन टिप्स से २० गुना मेरे पास थे| लेकिन कभी कभी अपने टिप्स काम नही आतेऔरों को सुनने पर भी मन को सुकून मिलता है सो मै वही कर रहा था|
रात के १२:०५ पर अपनी फ़ोन की वार्ता लाप को विराम देकर चुप-चाप बिस्तर पर लेट गया....मन मेंकुछ भी नही चल रहा था और मै सहसा सो चुका था गहरी नींद मै ये एहसास मुझे सुबह के ६:१५ को हुआ
सभी को मन ही मन धन्यवाद देकर, फिर अपने दिनचर्या से कभी छेरछार न करने की बात सोच कर, मैअपने मोर्निंग वाक् पे निकल गया|
पार्क में जब मै अपने प्राणायाम को पुरा कर चुका था और संपूर्ण मौन को महसूस करने के बाद ज्योंहीअपनी आँख को धीरे- धीरे खोला | तो प्रसन्नचित मेरे मन में प्रकृति की हरियाली को देखकर एक भाव सा उमड़ने लगा |
उसी समय प्रकृति ने मेरे मन से जो संवाद किया वो एक कविता की रूप ले चुकी थी| मै उसे लिख डाला जो अब आप लोंगों के सामने रखता हूँ .................
.....मै थाम लूँगा हाथ .....
ख़ुद को बदलने को
एक सांचे में ढलने को
जो तुम हो तैयार
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
गर ये जीवन नश्वर लगे
शान्ति ही वेंकटेश्वर लगे|
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ |
जो पाना था,
बो न पाया |
जो न खोना था ,
बो खोया |
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
विधा जो ज्ञात नही ,
नियति जिसका एहसास नही|
गर करनी हो ,
उसकी बात |
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
न हो कुछ पाने को शेष,
जीवन लगे अवशेष|
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ |
मै सत्य हूँ ...शिव हूँ ...और सुंदर भी
इसलिए मै थामुंगा तुम्हारा हाथ |
मै प्रकृति हूँ ...मै प्रकृति हूँ...मै प्रकृति हूँ...
कुंवर ...
अब मै पुनः अपने दिनचर्या में मशगुल हो चुका हूँ और अपने लिए एक शायरी मन में कौंधती रहती है
उसे आप सबसे शेयर करता हूँ .....यूँ है ये शायरी .....और हाँ ये मेरी अपनी है .....
अहले सुबह ख़ुद ही ख़ुद के लिए सबाल बन जाता हूँ,
रात बिस्तर तक आते -आते ख़ुद ही मिशाल बन जाता हूँ|
यही भाव आती रहे मेरे मन में ऐसा चाहता हूँ मै ...
अंत में आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें .........
कुंवर.....
दूसरी रात के ११ बजे थे और मै परेसान था अपने सारे उपायों के बिच की मै किसी तरह सो जाऊं|हार करमै सोचा अब दीदी से बात कर लूँ शायद कुछ आराम मिले|फ़ोन लगाया तो पता चला की दीदी, जीजा जीऔर मेरी भांजी (प्यारी सी ५ साल की है ) अभी तक जग रही है बात किया उन सभी से और खूब हँसा, अपनी भांजी की तोतली बातों को सुन कर|
इससे पहले मै अपने एक मित्र को भी कॉल किया था जो की अपने फैमली मेम्बेर्स के साथ डिनर मेंमशगुल थे, सो उनसे बाद में बात करना मुनासिब समझा| जब मै दीदी से बात करके खाली हुआ तो मेरेमित्र मिस कॉल कर चुके थे| सोचा चलो इनसे भी बात कर ही लूँ|
सो लगा उनसे सोने के लिए कुछ टिप्स लेने, अपनी क्षमता अनुसार उन्होंने टिप्स भी दिया लेकिनइमानदारी से कहूं तो उन टिप्स से २० गुना मेरे पास थे| लेकिन कभी कभी अपने टिप्स काम नही आतेऔरों को सुनने पर भी मन को सुकून मिलता है सो मै वही कर रहा था|
रात के १२:०५ पर अपनी फ़ोन की वार्ता लाप को विराम देकर चुप-चाप बिस्तर पर लेट गया....मन मेंकुछ भी नही चल रहा था और मै सहसा सो चुका था गहरी नींद मै ये एहसास मुझे सुबह के ६:१५ को हुआ
सभी को मन ही मन धन्यवाद देकर, फिर अपने दिनचर्या से कभी छेरछार न करने की बात सोच कर, मैअपने मोर्निंग वाक् पे निकल गया|
पार्क में जब मै अपने प्राणायाम को पुरा कर चुका था और संपूर्ण मौन को महसूस करने के बाद ज्योंहीअपनी आँख को धीरे- धीरे खोला | तो प्रसन्नचित मेरे मन में प्रकृति की हरियाली को देखकर एक भाव सा उमड़ने लगा |
उसी समय प्रकृति ने मेरे मन से जो संवाद किया वो एक कविता की रूप ले चुकी थी| मै उसे लिख डाला जो अब आप लोंगों के सामने रखता हूँ .................
.....मै थाम लूँगा हाथ .....
ख़ुद को बदलने को
एक सांचे में ढलने को
जो तुम हो तैयार
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
गर ये जीवन नश्वर लगे
शान्ति ही वेंकटेश्वर लगे|
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ |
जो पाना था,
बो न पाया |
जो न खोना था ,
बो खोया |
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
विधा जो ज्ञात नही ,
नियति जिसका एहसास नही|
गर करनी हो ,
उसकी बात |
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ|
न हो कुछ पाने को शेष,
जीवन लगे अवशेष|
तो आना मेरे साथ
मै थाम लूँगा हाथ |
मै सत्य हूँ ...शिव हूँ ...और सुंदर भी
इसलिए मै थामुंगा तुम्हारा हाथ |
मै प्रकृति हूँ ...मै प्रकृति हूँ...मै प्रकृति हूँ...
कुंवर ...
अब मै पुनः अपने दिनचर्या में मशगुल हो चुका हूँ और अपने लिए एक शायरी मन में कौंधती रहती है
उसे आप सबसे शेयर करता हूँ .....यूँ है ये शायरी .....और हाँ ये मेरी अपनी है .....
अहले सुबह ख़ुद ही ख़ुद के लिए सबाल बन जाता हूँ,
रात बिस्तर तक आते -आते ख़ुद ही मिशाल बन जाता हूँ|
यही भाव आती रहे मेरे मन में ऐसा चाहता हूँ मै ...
अंत में आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें .........
कुंवर.....
सोमवार, 21 सितम्बर 2009
भाव जो बह पड़ा ....
न तो प्यार लेता हूँ ,
और न ही तिरिस्कार ...|
मै तो बस करता हूँ ,
अपने लिए नियत हर कार्य ...|
कर्म फल लुभाता जरुर ,
पथ से डिगा सकता नहीं...|
फिसलन इतनी है पथ पर ,
पग पग पे पांव जमाता हूँ ...|
जाना है जिस डगर मुझे ,
उस पथ पे पांव थिराता हूँ ...|
कुछ बाधाएं कुछ विपदाएं ,
पथ की पहचान कराती हैं ...|
कुछ अनजानी सी भाषाएँ ,
अपनों की भान कराती है ...|
मै कर्मयोगी विमुख क्यों होऊं ,
कर्म फल के स्वादों से ...|
मै चलता हूँ जिस पथ पर ,
वही मेरी कहानी है ...|
मै जिन्दा हूँ ,
इसकी जिवंत निशानी है |
जब भी भाव हिचकोले लेने लगते हैं अंतस में, लिखता हूँ| कुछ पता नहीं होता क्या लिखना है ..बस लिखता जाता हूँ ...और शेयर कर लेता हूँ आप सब से ....
कुंवर...
और न ही तिरिस्कार ...|
मै तो बस करता हूँ ,
अपने लिए नियत हर कार्य ...|
कर्म फल लुभाता जरुर ,
पथ से डिगा सकता नहीं...|
फिसलन इतनी है पथ पर ,
पग पग पे पांव जमाता हूँ ...|
जाना है जिस डगर मुझे ,
उस पथ पे पांव थिराता हूँ ...|
कुछ बाधाएं कुछ विपदाएं ,
पथ की पहचान कराती हैं ...|
कुछ अनजानी सी भाषाएँ ,
अपनों की भान कराती है ...|
मै कर्मयोगी विमुख क्यों होऊं ,
कर्म फल के स्वादों से ...|
मै चलता हूँ जिस पथ पर ,
वही मेरी कहानी है ...|
मै जिन्दा हूँ ,
इसकी जिवंत निशानी है |
जब भी भाव हिचकोले लेने लगते हैं अंतस में, लिखता हूँ| कुछ पता नहीं होता क्या लिखना है ..बस लिखता जाता हूँ ...और शेयर कर लेता हूँ आप सब से ....
कुंवर...
शनिवार, 5 सितम्बर 2009
कितने कल के बाद
कितने कल के बाद ...
देखो "आज " आया |
संग लग ले ---
क्या पता फिर आए न आए |
मीरा को गिरधर जी मिले थे
इसी आज में |
अर्जुन का द्वंद छठा था
इसी आज में |
अनुपम वेला ---
संधि वेला ------(ब्र्ह्ममुहुर्त की वेला )
भी मिलती है ---
इसी आज में |
शंकर की ये 'मोक्ष 'हो --
या फिर बुद्ध की 'निर्वाण '--
या फिर पातंजल का 'कैवल्य '--
ये सब मिलते हैं इसी आज में |
कितने कल के बाद--
देखो "आज " आया |
जो भी है बो "आज "है भैया--
कल तो --
धोखे की पहली किरण है|
जो भी है बो आज है भैया ---
बस आज है भैया ---
चाहे जितना भी नुरा-कुश्ती कर ले ये मेरी बुद्धि मेरे मन से लेकिन तब तक कुछ नही पायेगा जब तक आज को जीना न सिख ले सम्पूर्णता से |कुछ मिलने बाला नही ---
कुंवर -------
देखो "आज " आया |
संग लग ले ---
क्या पता फिर आए न आए |
मीरा को गिरधर जी मिले थे
इसी आज में |
अर्जुन का द्वंद छठा था
इसी आज में |
अनुपम वेला ---
संधि वेला ------(ब्र्ह्ममुहुर्त की वेला )
भी मिलती है ---
इसी आज में |
शंकर की ये 'मोक्ष 'हो --
या फिर बुद्ध की 'निर्वाण '--
या फिर पातंजल का 'कैवल्य '--
ये सब मिलते हैं इसी आज में |
कितने कल के बाद--
देखो "आज " आया |
जो भी है बो "आज "है भैया--
कल तो --
धोखे की पहली किरण है|
जो भी है बो आज है भैया ---
बस आज है भैया ---
चाहे जितना भी नुरा-कुश्ती कर ले ये मेरी बुद्धि मेरे मन से लेकिन तब तक कुछ नही पायेगा जब तक आज को जीना न सिख ले सम्पूर्णता से |कुछ मिलने बाला नही ---
कुंवर -------
सोमवार, 17 अगस्त 2009
दो शब्द
थका हूँ ,
हारा नहीं |
अकेला हूँ ,
बेसहारा नहीं |
नियति...मानता हूँ ,
लेता... सहारा नहीं |
थका हूँ ,
हारा नहीं |
........................................................................................................................................
........................................................................................................................................
........................................................................................................................................
कुछ दिनों से .....
दर्द की...........
तलाश थी ........
मिल गयी |
अपनों सी.......
कुछ आश थी ........
मिल गयी |
........................................................................................................................................
........................................................................................................................................
........................................................................................................................................
हारा नहीं |
अकेला हूँ ,
बेसहारा नहीं |
नियति...मानता हूँ ,
लेता... सहारा नहीं |
थका हूँ ,
हारा नहीं |
........................................................................................................................................
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कुछ दिनों से .....
दर्द की...........
तलाश थी ........
मिल गयी |
अपनों सी.......
कुछ आश थी ........
मिल गयी |
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........................................................................................................................................
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रविवार, 5 जुलाई 2009
कुछ ना होकर भी बहुत कुछ होना
कुछ भी नही है हमारे बीच...
फिर भी कुछ होने का एहसास......
दूर हूँ ...
फिर भी पास होने का एहसास ......
क्या है ये...
कुछ तो है ... पता नहीं!!!!!!
शायद 'शंकर' की 'माया ' हो...
ज्ञानी जन जिसे कुछ ना होने-
की संज्ञां देते हैं ......
कहते हैं भ्रम है ...
और शायद हो भी ......
लेकिन ये कुछ न होकर भी...
बहुत कुछ है ......
ज्येषठ के बाद...
आषाढ़ की पहली बरसात है ......
ये होने ना होने के बीच का एहसास है ...
जिसे शब्दों से उकेरा नहीं जा सकता .......
इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है ...
जैसे एक भक्त ...
भक्ति के माधयम से ......
भगवंत को महसूस करते हैं .........
बस यही है बो एहसास ...
जो कुछ ना होकर भी ...
बहुत कुछ है......
दूर होकर भी पास है ...
ऐसा तो मै मानता हूँ , आप क्या मानते है कहिये ...स्वागत है आपके विचार का......
फिर भी कुछ होने का एहसास......
दूर हूँ ...
फिर भी पास होने का एहसास ......
क्या है ये...
कुछ तो है ... पता नहीं!!!!!!
शायद 'शंकर' की 'माया ' हो...
ज्ञानी जन जिसे कुछ ना होने-
की संज्ञां देते हैं ......
कहते हैं भ्रम है ...
और शायद हो भी ......
लेकिन ये कुछ न होकर भी...
बहुत कुछ है ......
ज्येषठ के बाद...
आषाढ़ की पहली बरसात है ......
ये होने ना होने के बीच का एहसास है ...
जिसे शब्दों से उकेरा नहीं जा सकता .......
इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है ...
जैसे एक भक्त ...
भक्ति के माधयम से ......
भगवंत को महसूस करते हैं .........
बस यही है बो एहसास ...
जो कुछ ना होकर भी ...
बहुत कुछ है......
दूर होकर भी पास है ...
ऐसा तो मै मानता हूँ , आप क्या मानते है कहिये ...स्वागत है आपके विचार का......
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